Thursday, October 28, 2021
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युवा वर्ग मानसिक तनाव को लेकर अधिक सजग : डॉ नीरजा अग्रवाल

डॉ अग्रवाल ने कहा, युवा वर्ग की मनोवैज्ञानिक जांच क्या है? और एक किशोर को इसकी कब आवश्यकता होती है, अभिभावकों को बच्चों की इस जरूरत को कैसे समझना चाहिए?

नयी दिल्ली: कोरोना ने हर उम्र और तबके के लोगों को प्रभावित किया है। डॉ. नीरजा अग्रवाल (पुनर्वास और किशोर मनोविज्ञान विशेषज्ञ, दिल्ली) ने कहा कि किशोर और युवाओं के मानसिक तनाव, भावनात्मक और व्यावहारिक स्वास्थ्य पर लघु और दीर्घकालीन किस तरह का प्रभाव पड़ सकता है।

डॉ अग्रवाल ने कहा, यह समय सभी के लिए मुश्किल है। हम सभी शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी का सामना कर रहे हैं। किशोर भी इस समस्या से अछूते नही हैं। परिस्थितियों के साथ सामंजस्य करना उनके लिए भी मुश्किल हो रहा है, इसका असर उनकी नियमित दिनचर्या पर पड़ रहा है, जैसे कि या तो वह बहुत अधिक खा रहे हैं या बिल्कुल भी नहीं।

कुछ किशोर व्यवहार में बहुत आक्रामक हो गए हैं, कुछ युवाओं के व्यवहार गंभीर ओसीडी (अब्सेसिव कंपलसिव डिस्आर्डर) का असर दिख रहा है, क्योंकि उन्हें बाहर आने जाने की मनाही है घर पर भी नियमित दिनचर्या नहीं है, इसलिए मोबाइल स्क्रीन पर औसतन बिताए जाने वाले समय की अवधि बढ़ रही है, स्क्रीन टाइम बढ़ने से एकाग्रता और ध्यान की कमी आदि समस्या भी बढ़ी हैं।

जिन परिवारों में किसी अपने प्रियजन को खोया उनमें यह दिक्कत अधिक बढ़ गई और ऐसी स्थिति से उपजे तनाव का मुकाबला करना अधिक मुश्किल हो जाता है।

डॉ अग्रवाल ने कहा, किशोरों की मनोवैज्ञानिक जांच क्या है? और एक किशोर को इसकी कब आवश्यकता होती है, अभिभावकों को बच्चों की इस जरूरत को कैसे समझना चाहिए? के सन्दर्भ में बताया कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण या मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन किसी भी व्यक्ति की मानसिक, व्यावहारिक और भावनात्मक स्थिति का मूल्यांकन है।

किशोर अकसर अपनी भावनाओं को बताने में इसलिए हिचकते हैं कि कहीं कोई उनके बारे में राय न बना लें अपना निर्णय न थोप दे, इसलिए मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में बच्चे के माता पिता के साथ ही उनके करीबी मित्रों से भी बात की जाती है।

किशोर के व्यवहार से अकसर इस बात का पता लगाना मुश्किल होता है कि वह तनाव की किसी गंभीर स्थिति से गुजर रहे हैं या फिर यह उनका साधारण टीन एज ग्रुप के बदलाव का व्यवहार है।

किशोर भावनात्मक अनुभवों को अधिक तीव्रता से स्वीकार करते हैं, और मजबूती से भावनात्मक स्थिति पर प्रतिक्रिया भी देते हैं, कम ही समय में उनके मन में कई तरह की भावनाओं का उद्गम होता रहता है।

बावजूद इसके कुछ विशेष तरह लक्षणों से किशोरों के तनाव की पहचान की जा सकती है, जैसे कि बना वजह का गुस्सा या चिड़चिड़ापन, आक्रामक और हिंसात्मक व्यवहार, सामाजिक दूरी बनाना, बहुत अधिक नकारात्मकता, किसी भी शौक या चीज में रुचि नहीं लेना, किसी भी तरह की नियमित दिनचर्या को फॉलो नहीं करना, बहुत अधिक खाना या बिल्कुल भी नहीं खाना, खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करना और अधिक गंभीर स्थिति में आत्महत्या का प्रयास करना आदि।

परिजन या केयर गीवर किशोर में इस तरह के किसी भी बदलाव को ध्यानपूर्वक नोटिस करना होगा। यदि इस तरह के बदलाव दो साल से अधिक तो किसी विशेषज्ञ से सलाह अवश्व लेनी चाहिए।

महामारी के दौरान किशोरों को होने वाले मानसिक तनाव को दूर करने के लिए अभिभावकों के लिए सलाह के सन्दर्भ में पूछने पर डॉ अग्रवाल ने कहा कि अभिभावकों को यह समझना होगा कि किशोर इस समय सबसे अधिक मुश्किल समय से गुजर रहे हैं।

कोविड की वजह से लगाई गईं पाबंदियों के कारण बच्चे बाहर की गतिविधियों में भाग नहीं ले पा रहे हैं, लंबे समय से स्कूल और कॉलेज बंद हैं तो बच्चे कैंपस लाइफ और दोस्तों को मिस कर रहे हैं, जिनसे अकसर वह अपने मन की बातें साझा करते थे, इस सभी परिस्थितियों के बीच सामंजस्य बनाना बेहद मुश्किल है।

किशोरों की समस्याओं को धैर्यपूर्वक समझें, यह जानने की जरूरत है कि किशोरों की उर्जा को पारिवारिक कार्यक्रम और ऐसी रचनात्मक कार्यों में लगाए जिससे वह खुद को उदासीन न महसूस करें। इस समय उनका दोस्त बनें, उनकी सराहना करें, कार्य के लिए प्रोत्साहित करें।

माता-पिता को भी अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करने की कोशिश करनी चाहिए, वह भी कोशिश करें कि दिनभर में उनका स्क्रीन टाइम कम हो, लेकिन इस बात का निर्णय भी बच्चों से बात करने के बाद ही लें।

अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन टाइम के लिए कठोर नहीं होना चाहिए क्योंकि इंटरनेट आजकल मनोरंजन, शिक्षा और दोस्तों से जुड़े रहने के लिए जरूरी हो गया है, बावजूद इसके जरूरत से अधिक स्क्रीन टाइम कई तरह की समस्या को जन्म देता है।

मोबाइल की जगह परिवार को एक साथ अधिक समय बिताने पर जोर देना चाहिए। बच्चों के रूचिकर विषयों पर चर्चा करने और एक साथ कई गेम खेलने से परिवार को मजबूत करने का यह सबसे बेहतर अवसर हो सकता है।

महामारी के इस समय में एक अच्छे अभिभावक बनकर मिसाल पैदा की जा सकती है। भारत में लोग मानसिक तनाव से जुड़ी बातों को खुलकर नहीं करते हैं, ऐसी स्थिति में हम किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को समझने की बात कैसे कर सकते हैं?

इस सन्दर्भ में पूछने पर डॉ अग्रवाल ने कहा, बिल्कुल सही, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरुकता की कमी के कारण लोग तनाव को लेकर खुलकर बात नहीं करते हैं, मानसिक स्वास्थ्य को दूर करने के लिए संसाधनों की कमी है, इसके साथ ही इस संदर्भ में की गई बातों को लोग नेगेटिव अर्थ अधिक निकालते हैं। लेकिन अब समय बदल रहा है, युवा वर्ग मानसिक तनाव को लेकर अधिक सजग है, युवा सामाजिक और व्यवहारिक मुद्दों पर बात करने की जरूरत को अच्छे से समझते हैं।

युवा तनाव के विषय को लेकर आगे आ रहे हैं, और इसे कैसे दूर किया जाएं इसका भी समर्थन कर रहे हैं। इस सभी के बावजूद मानसिक स्वास्थ्य के लिए ऑनलाइन काउंसलिंग को अधिक विस्तृत किया जाना चाहिए, जिससे जरूरत पड़ने पर युवा आपात स्थिति में भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सीधे संपर्क कर सकें।

[हैम्स लाइव]

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