Thursday, October 28, 2021
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नारीवादी लेखिका और जनवादी आंदोलन की मजबूत आवाज कमला भसीन अब नहीं रहीं

कमला भसीन जो नारीवादी लेखन और आंदोलन की बहुत मज़बूत आवाज़ थीं के निधन को एक युग का अंत माना जा रहा है।

नयी दिल्ली: प्रख्यात नारीवादी लेखिका और जनवादी आंदोलन की मजबूत आवाज कमला भसीन का 25 सितंबर को लगभग 3 बजे सुबह निधन हो गया।

 

कमला भसीन का जाना महिला आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। आंदोलन के अग्रदूतों में से एक मानी जाने वाली कमला भसीन ने दक्षिण एशियाई नारीवादी आंदोलन (यानी फेमिनिस्ट मूवमेंट) को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

कमला भसीन नारीवादी लेखन और आंदोलन की बहुत मज़बूत आवाज़ थीं। उनका जाना एक युग का अंत माना जा रहा है। उनके देहांत से स्त्रीवादी आंदोलन सहित सभी जन आंदोलनों की अपूरणीय क्षति हुई है.

कमला भसीन का जन्म 24 अप्रैल 1946 को हुआ था था।

नारीवादी कार्यकर्ता, कवि, लेखक और सामाजिक वैज्ञानिक के तौर पर जानी जाने वाली कमला भसीन ने महिलाओं के लिए 1970 से काम करना शुरू कर दिया था। लैंगिक भेदभाव, शिक्षा, मानव विकास और मीडिया पर उनका काम केंद्रित रहा था।

कमला भसीन कहती थीं, “सोचकर देखिए कि आज अगर महिलाएं कह दें कि या तो हमारे साथ सही से व्यवहार करें नहीं तो हम बच्चा पैदा नहीं करेंगे। क्या होगा? होगा ये कि सेनाएं ठप हो जाएंगी। मानव संसाधन कहां से लाएंगे आप?”

Janjwar के एक लेख के अनुसार जेंडर इक्विलिटी पर कमला भसीन के महत्वपूर्ण काम के लिए वह कई सम्मानों से नवाजी जा चुकी हैं। इसी साल मार्च में समाज के लिए असाधारण काम करने वाली जिन 12 हस्तियों को सम्मानित किया था उनमें से कमला भसीन भी एक थीं।

नारीवादी लेखिका कमला भसीन अपने भाषणों में जगह—जगह कहती भी थीं, ‘जब बच्चा पैदा होता है तो वह केवल इंसान होता है, मगर समाज उसे धर्म, भेद, पंथ, जाति आदि में बां कर उसकी पहचान को संकीर्ण बना देता है। प्रकृति इंसानों में भेद करती है लेकिन भेदभाव नहीं करती। भेदभाव करना समाज ही सिखाता है। इस भेदभाव से ही लोगों में एक दूसरे के प्रति नफरत बढ़ रही है और हिंसा में बढ़ोतरी हो रही है।’

कमला भसीन ने कहा था, ‘विधान ने सालों पहले कह दिया कि स्त्री और पुरुष समान है। समाज में आज भी महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग नियम है और उसी की परिणति है कि देश में अब तक 3.5 करोड़ लड़कियों को कोख में ही खत्म कर दिया गया।

पितृसत्तात्मक समाज के चलते स्त्री-पुरुषों के अधिकारों में विभेद से पुरुषों ने जहां उत्तरोत्तर प्रगति की है, वहीं महिलाएं दबती चली गईं। किसी एक महिला को बुर्का पहनाने से अच्छा है कि उस बुर्के की सौ पट्टियां बनाकर पुरुषों की आंखों पर बांध दी जाए, ताकि बुरी नजर से ही बचा जा सके।’

महिला और मानवाधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कमला भसीन के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहती हैं, ‘कमला भसीन नारीवादी लेखन और आंदोलन की बहुत मज़बूत आवाज़ थीं। उनका जाना एक युग का अंत है, उनके जाने से स्त्रीवादी आंदोलन सहित सभी जन आंदोलनों की अपूरणीय क्षति हुई है।’

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